Saturday, December 18, 2010

हिमाक़त

प्राण नहीं है मेरे तोह मेरा धड लेकर क्या करोगे ?.
ज्ञान नहीं है मेरा तोह मेरा सर लेकर क्या करोगे ?.
अंधे हो तुम मेरे जहां में , हमकाती मेरी निगाहों में.
दृष्टिकोण नहीं है मेरा तोह मेरे नयन लेकर क्या करोगेहीं ?

Monday, February 1, 2010

Ye Dekh Gagan Mujh Mein Lay Hai

दो न्याय अगर तो आधा दो, और, उसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

लेकिन दुर्योधन
दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला।

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-
'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।

सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

यह देख जगत का आदि-अन्त, यह देख, महाभारत का रण,

मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, कहाँ इसमें तू है।