रहेने को सदा देहेर में आता नहीं कोई,
तुम जैसे गए वैसे भी जाता नहीं कोई.
एक बार तोह खुद मौत भी घबरा गेइ होगी,
यूँ मौत को सीने से लगता नहीं कोई.
डरता हूँ कहीं खुश्क ना हो जाये समंदर,
राख अपनी आप बहता नहीं कोई.
साकी से गिला था तुम्हें मैखाने से शिकवा,
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई.
माना की उजालों ने तुम्हें दाग दिए थे,
बे रात ढले शमा बुझाता नहीं कोई.
रहेने को सदा देहेर में आता नहीं कोई,
तुम जैसे गए वैसे भी जाता नहीं कोई.
Wednesday, August 3, 2011
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